The Mother Tongue

अपने मित्र द्वारा लिखित एक ‘ब्लॉग पोस्ट’ को पढ़ कर मन में विचार उमड़ा की हम भी कुछ अपनी मातृ भाषा में लिखने का प्रयत्न करे। विचार भला था किन्तु कही से भी आसान नहीं, दरअसल भारतीय शिक्षा प्रणाली की खास बात यह है की वो अंग्रेजी भाषा को परम  दर्जा देती है और यह भूल जाती है की केवल १२५ लाख (स्रोत – अंग्रेजी अख़बार टी ओ इ) आबादी ही अंग्रेजी बोलना या पढ़ना जानती है ।

Courtesy - The-NRI.com

अगर आपको  ‘कॉन्वेंट’ विद्यालय में पढने का सौभाग्य प्राप्त हुआ होगा तो आप मेरी बात को और गंभीरता से समझ पाएंगे। गौर करने की बात यह है की अंग्रेजो द्वारा स्थापित शिक्षा प्रणाली में ‘इंग्लिश’ पर ध्यान देने का एक मात्र कारण यह था कि  वह ‘क्लर्की’ के लिए भारतीय नागरिको का उपयोग करना चाहते थे। अंग्रेज तो चले गए मगर अपने पीछे अंग्रेज़ी को छोड़ गए और आजाद हिंद में एक और  उंच नीच का पैमाना लगा गए।

खैर यह सब तो ऐतिहासिक बाते है जो की आज हास्यास्पद प्रतीत होती है, मुददे की बात यह है की हम इक्कीसवी सदी के भारतीय नागरिक अपनी प्राचीन भाषा को ठुकरा कर एक निम्नतर भाषा को आँख मूंद कर आत्मसात करने में मगन है। हिंदी दुनिया की उन चन्द बोली में से एक है जो ‘फोनेटिक’ अर्थात स्वरविज्ञानी या मेरे थोड़े ज्यादा पढ़े लिखे मित्रो के लिए एक ऐसी भाषा है जिसकी लिखाई उसकी बोली से निर्धारित होती है। इसकी उपयोगिता अगर आपको जाननी है तो आप कृपा करके एक बार ‘गूगल.कॉम’ का सहारा ले और अपनी दुविधा से मुक्ति पाए।

अगर आज मैं शिक्षक, शिष्य और उनके अभिभावकों की समीक्षा करूँ तोह एक बात तय है की सभी को अंग्रेज़ी भाषा से बेहत लगाव है । फर्राटेदार ‘इंग्लिश’ में पर फटे हाल हिंदी में कहना शायद उचित न हो मगर मैं अपने सहपाठियों के बारे में यही कहने  मजबूर हूँ, ऐसा कही से नहीं है की मैं उस श्रेड़ी में नहीं आता पर क्या करूँ इन्सान हूँ, दूसरो की कमी कमरा लगती है और अपनी कटोरी । और बहुत कुछ कहने का ‘मूड’ है मगर वक़्त और भाषा से विकलांग हूँ, अपने दुःख दर्द को व्यक्त करने के एकलौते माध्यम पर एक और अध्याय जुड़ जायेगा, कलेजे को लेमोन चूस वाली रहत मिलेगी और यह राही अपनीपूँजीवादी मानसिकता की राह पर निकल जायेगा।

इंग्लैंड की इस भाषा  का सबसे खास बात यह भी है की हमारे देश में ३० दिन के अन्दर ही इसमें महारत प्राप्त कराने वालों की कमी नहीं है, और तो और निर्मल बाबा की तरह एक वक़्त पर अंग्रेजी को भी टी वी पर भी बेचा जा चुका गया है। अपने अनुच्छेद की रचना के दौरान रविश जी की भी याद आई जब उन्होंने अपनी समीक्षा अंग्रेज़ी भाषा पर की थी, एक पंक्ति उनकी हमारे जहन में बस गयी, “जो भाषा महज २५० रूपए में सीखी जाये उससे  हिंदी को कतई खतरा नहीं क्यूँ की हिंदी का मज़ा ही कुछ और है” ।

मगर यह हमारे देश के युवा को कौन समझाए, एक ज्ञानी पुरुष ने मुझसे यह तक कह डाला था की वैश्विकरण के मददे नज़र हिंदी भाषा को शिक्षा के चंगुलसे मुक्त कर देना चाहिए। मन में मेरे बहुत कुछ आया बोलने के लिए मगर मैं अपने आप को हिंदी की समृधि को बयां करने में असमर्थ समझता हूँ इस लिए मैं रुक गया और अपनी अंग्रेजी में लिखित रामायण को वापस पढने लगा ।

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5 thoughts on “The Mother Tongue

  1. भाषा के प्रति चेतना जगाने का अच्छा प्रयत्न किया है आपने…
    दशा और दिशा दोनों ही सोचनीय है हिंदी की तत्कालीन समय में…
    चुकी आपने पहले ही लिख दिया है की आप हिंदी भाषा में थोड़े तंग हैं तो, आपने शब्दों और व्याकरण में होने वाली गलतियों के दोष के आरोप से अपने आपको मुक्त रखा है..

  2. bohat badiya …..bohat acha….sab se badiya baat yeh hai ki aap ki angrezi ke mukable yeh samajh mein aaya

  3. mujhe lagta hai ki bharat mein logon ke beech jo cultural divide hai…uska sabse bada kaaran hi english hai…

    aur kyuki meri hindi pe itni command nai hai,,,so i revert back to english….

    a well-written, well-though about article…
    an appreciable effort…

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